Thursday, October 15, 2015
"लोमड़ी के घर सारस के नौकरी"
नाक के अन्दर का फुसरी (फुंसी) बड़ा तकलीफदेह होता है। न फोड़ते बनता है न छोड़ते बनता है। लेकिन भारत में हालात ऐसे हैं कि लोग इसको छोड़े भी रहते हैं और फोड़ते भी रहते हैं और नतीजा ये होता है कि ये फुसरी interval मे ही भगन्दर बन जाता है। ये मसला ख़ास कर के मैंने professionals और professional conduct के सन्दर्भ में उठाया है। 100 में से 90 professionals को अपना काम ही ठीक से पता नहीं है क्यूँकि भारतवर्ष मे कुछ मिले न मिले, डिग्री तो मिल ही जाती है। IIIT, PPIT, BBIT से लेकर ZIT types institutes कुकुरमुत्तों की तरह गली गली में उगे हैं। मेरे घर में काम करने आया बिजली मिस्त्री जब हमसे पूछता है कि 'ये भिया, ई में गरम तार कोन हवा' तो मन करता है कह दें -अरे भाई, कोई एक तार पकड़ के लटक न जाओ, मर जाओगे ता हम भी जान जायेंगे कि उहे वाला गरम था। नहीं मरे त ठंडा था।
बहुत पहले भगवान ने हर इंसान को एक अमृत कलश दिया ताकि वो और अच्छे तरीके से जी सकें। साथ में ये भी कहा कि ये कभी ख़ाली नहीं होगा लेकिन अमृत का न तो दुरुपयोग करना और न अपमान। अब भाई, इंसान बन्दर का औलाद ऐसे ही थोड़े न है। पहले 8 -10 दिन तो खाने में एक बूँद डाला उसने, उसके बाद उसी अमृत से चाय भी बनाने लगा, एक महीने बाद तो सब उसी अमृत से खाना भी बनाने लगे। एक intelligent बन्दर (सुलेमानी कीड़ा वाला) ये सोचा कि ये खत्म तो होगा नहीं तो क्यों न नहाना धोना भी इसी से कर लिया जाए। बस तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर, सब उसको follow करने लगे और नतीजा ये हुआ कि जिस अमृत को ईश्वर ने जीवन बचाने के लिए दिया था, उससे लोग अपना अंग-विशेष भी धोने लग गए। क़रीब दो महीने बाद एक आदमी मर गया तो उसके बेटे ने उसके मुँह में अमृत चुआ दिया लेकिन आदमी तो ज़िंदा हुआ नहीं। वह लगा भगवन को कोसने। भगवान प्रकट हुए और कहा अमृत एक तासीर का नाम है बेटा जो तुमलोगों ने पनछुआ कर कर के खो दिया। अब कलश टाँगे रहो गले में। तो यही होता है भईया गलत जगह नौकरी करने से। लोग तुम्हारे टैलेंट को actual स्थान न देकर उस से नहाना, खाना औए पनछुआ करना शुरू कर देते हैं। अब या तो कलश ले के लौट जाओ वापस या नहीं तो उसको गले में टांगने के लिए दुनिया अभी सर्वस्व आबाद है।
और मैंने लोमड़ी की नौकरी छोड़ दी।
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